Monday, October 13, 2014

THE COMMON LINEAGE OF GUHILAUT / SISODHIYA RAJPUTS OF MEWAR , SHAHS ROYAL FAMILY OF NEPAL AND BHONSALE RAJPUTS OF MARATHA CLAN

बाप्पा रावल के वंश के दो महानायक …छत्रपति शिवजी और महाराणा प्रताप 

1. रावल बप्पा ( काल भोज ) - 734 ई० मेवाड राज्य के गहलौत शासन के सूत्रधार।
2. रावल खुमान - 753 ई०
3. मत्तट - 773 - 793 ई०
4. भर्तभट्त - 793 - 813 ई०
5. रावल सिंह - 813 - 828 ई०
6. खुमाण सिंह - 828 - 853 ई०
7. महायक - 853 - 878 ई०
8. खुमाण तृतीय - 878 - 903 ई०
9. भर्तभट्ट द्वितीय - 903 - 951 ई०
10. अल्लट - 951 - 971 ई०
11. नरवाहन - 971 - 973 ई०
12. शालिवाहन - 973 - 977 ई०
13. शक्ति कुमार - 977 - 993 ई०
14. अम्बा प्रसाद - 993 - 1007 ई०
15. शुची वरमा - 1007- 1021 ई०
16. नर वर्मा - 1021 - 1035 ई०
17. कीर्ति वर्मा - 1035 - 1051 ई०
18. योगराज - 1051 - 1068 ई०
19. वैरठ - 1068 - 1088 ई०
20. हंस पाल - 1088 - 1103 ई०
21. वैरी सिंह - 1103 - 1107 ई०
22. विजय सिंह - 1107 - 1127 ई०
23. अरि सिंह - 1127 - 1138 ई०
24. चौड सिंह - 1138 - 1148 ई०
25. विक्रम सिंह - 1148 - 1158 ई०
26. रण सिंह ( कर्ण सिंह ) - 1158 - 1168 ई०
27. क्षेम सिंह - 1168 - 1172 ई०
28. सामंत सिंह - 1172 - 1179 ई०
29. कुमार सिंह - 1179 - 1191 ई०
30. मंथन सिंह - 1191 - 1211 ई०
31. पद्म सिंह - 1211 - 1213 ई०
32. जैत्र सिंह - 1213 - 1261 ई०
33. तेज सिंह -1261 - 1273 ई०
34. समर सिंह - 1273 - 1301 ई० (एक पुत्र कुम्भकरण नेपाल चले गए नेपाल के राज वंश के शासक कुम्भकरण के ही वंशज हैं)

35.रतन सिंह ( 1301-1303 ई० ) - इनके कार्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौडगढ पर अधिकार कर लिया। प्रथम जौहर पदमिनी रानी ने सैकडों महिलाओं के साथ किया। गोरा - बादल का प्रतिरोध और युद्ध भी प्रसिद्ध रहा।

36. महाराणा हमीर सिंह ( 1326 - 1364 ई० ) - हमीर ने अपनी शौर्य, पराक्रम एवं कूटनीति से मेवाड राज्य को तुगलक से छीन कर उसकी खोई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की और अपना नाम अमर किया महाराणा की उपाधि धारं किया। इसी समय से ही मेवाड नरेश महाराणा उपाधि धारण करते आ रहे हैं। इनके वंसज सिसोदिया कहलाये इनके छोटे पुत्र सज्जन सिंह सत्तार दक्षिण (महाराष्ट्र) में चले गए

**A – Mewar Sisodiya (Chetra Singh)
**B – Maharastrian Sisodiya (Sajjan Singh)

A (From Chetra Singh)
37.A महाराणा क्षेत्र सिंह,
38.A महाराणा लाखा सिंह
39.A महाराणा मोकल सिंह 1421/1433
40.A महाराणा कुम्भकर्ण सिंह 1433/1468
41.A महाराणा उदय सिंह I 1468/1473
42.A महाराणा रैमल सिंह 1473/1508,
43.A महाराणा संग्राम सिंह I 1508/1528
44.A महाराणा रतन सिंह 1528/1531,
45.A महाराणा विक्रमादित्य सिंह 1531/1536
46.A महाराणा उदय सिंह II, 1537/1572, -
47.A महाराणा प्रताप सिंह II, 1572/1597,

B (From Sajjan Singh)
37.B सज्जन सिंह (सिम्हा1310)
38.B दिलीप सिंह -
39.B शिवाजी प्रथम
40.B भोसजी
41.B देवराजजी -
42.B उग्रसेन -
43.B माहुलजी -
44.B खेलोजी
45.B जानकोजी
46.B संभाजी
47.B बाबाजी
48.B मालोजी
49.B शहाजी
50.B छत्रपति शिवाजी

The royal Bhonsle Maratha clan, to which the Maratha Empire's founder Shivaji belonged, also claim descent from the Sisodia clan. According to this theory, Shivaji's ancestors migrated from Mewar to the Deccan.Pandit Gaga Bhatt of Varanasi presented a genealogy declaring that Shivaji's ancestors were Kshatriyas descended from the solar line of the Rajput Ranas of Mewar. Documents written in Farsi in the possession of the Ghorpade family of Mudhol claim that Bhonsle and Ghorpade are Sisodia Rajputs: these documents, which were translated in the 1930s, refer to Rana Ugrasena, father of Karna Singh and his younger brother Shubha Krishna, as common ancestors of both the Bhonsle and Ghorpade. The Ghorpade title was given to Karna Singh and his son, Bhimsen, in recognition of their capture of the fort of Khelna (presently, Vishalgad) in 1470 AD with the help of an Iguana, which is called Ghorpad in Marathi. These Farsi firmans given to ancestors of Ghorpade and Bhonsle by early Bahamani Sultans and then Adil Shahi Sultans link both the Bhonsle and Ghorpade families to Ugrasena who is considered a common ancestor by them.


RANI  KALWATI OF GUJRAT :  FORGOTTEN HEROINE

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आज हम आपको एक ऐसी क्षत्राणि की कथा बता रहे हे जिसने अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए
रानी कलावती:- 
अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ? 
अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | अंत:पुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गया तो उसकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा - " स्वामी ! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ,मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये |
सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भलें हों पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त है |
" कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी |
छोटी सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था | रानी कलावती शस्त्र-सञ्चालन में निपुण थी |
अपने पति की पार्श्व रक्षा करती हुई वह शत्रु का संहार कर रही थी | इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक |
घमासान युद्ध हो रहा था,इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा जिससे वे बेहोश हो गए | कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र सञ्चालन कर पति के आस-पास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया | युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिको के आगे वेतनभोगी यवन सेना पराजित हुई |
विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटी | राजवैध ने परिक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आहात होने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए है,उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है |
विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था | इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाय,उसे तलाश करने का प्रयास किया जाय,रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस डाला |
विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थी फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया | जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेमप्रतिमा की मृत देह नजर आई |
अपने प्राणोंत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है |
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